लोकलाइज़ेशन और हिंदी

पिछले कुछ सालों से लोकलाइज़ेशन का ज़ोर से शोर मचा हुआ है. बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत में बाज़ार बढ़ाने के लिए भारतीय भाषाओं की अहमियत को समझ चुकी हैं. ज़ाहिर है कि सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी उनकी हिटलिस्ट में शामिल है.

मान लीजिए आप किसी अजनबी देश में हैं… अजनबी लोग, अलग भाषा, अलग संस्कृति, सब कुछ अलग. एक दिन आप खाने की तलाश में निकलते हैं. बहुत सारे रेस्टोरेंट के बीच कहीं से आपको हिंदी गाने की आवाज़ आती सुनाई पड़ती है और आपके कदम खुद-ब-खुद उस ओर बढ़ जाते हैं. आपको उस रेस्टोरेंट का बैकग्राउंड, उसकी क्वालिटी, खाने की कीमत- कुछ भी पता नहीं, फिर भी आपके कदम वहां पहुंचकर ही ठहरते हैं. क्या वजह है उस ओर खिंचकर जाने की? जी हां, बिल्कुल ठीक, वजह है आपकी भाषा, भाषा से जुड़ी संवेदना और अपनापन. और यही वजह है लोकलाइज़ेशन के अस्तित्व की.

बीसवीं शताब्दी में दुनिया भर में होने वाले फेर-बदल के चलते आया था उदारीकरण. उदारीकरण ने जन्म दिया ग्लोबलाइज़ेशन यानी भूमंडलीकरण को. ग्लोबलाइज़ेशन एक प्रक्रिया है, जिसके लिए कई चीज़ें ज़रिया बनती हैं. लोकलाइज़ेशन उन्हीं में से एक ज़रिया है, जो बाज़ार की ज़रूरतों के चलते चलन में आया. कम शब्दों में कहें, तो लोकलाइज़ेशन एक मीडियम है, जिसके ज़रिए ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया पूरी होती है. लोकलाइज़ेशन का मतलब है स्थानीयकरण यानी जिस देश में आपको अपना प्रॉडक्ट बेचना है, आपको वहाँ के लोगों के परिवेश के हिसाब से अपने प्रॉडक्ट को ढालना. पश्चिमी जर्मनी के पूर्व चांसलर विली ब्रांट ने एक बार कहा था, ‘If I am selling to you, I speak your language. But if I am buying, dann müssen sie Deutsch sprechen’. यानी ‘अगर मैं आपको कोई सामान बेच रहा हूँ, तो मैं आपकी भाषा बोलूंगा लेकिन अगर मैं सामान खरीद रहा हूँ, तो आपको जर्मन भाषा बोलनी पड़ेगी.’ उनका यह उद्धरण लोकलाइज़ेशन की आधारशिला माना जा सकता है.

पिछले 20 सालों में भारत में आम आदमी की खरीदारी करने की आर्थिक शक्ति और उसकी इच्छा शक्ति दोनों ही बढ़ी हैं. भारतीय बाज़ारों की घात में बैठी कंपनियों के लिए यह समय स्वर्ण युग जैसा है. करोड़ों खरीदारों के बाज़ार में अपनी जगह बनाने के लिए दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां हर संभव तरीके अपना रही हैं. दूसरी ओर, इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल ने भारत की बाज़ार के रूप में लोकप्रियता को आसमान पर पहुँचा दिया है. हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इंटरनेट इस कदर छा चुका है कि इसके बिना ज़िंदगी क्या होगी, अंदाज़ा लगाना मुश्किल है. कहीं जाने के लिए रास्ते देखने हों, खाना ऑर्डर करना हो, टैक्सी बुक करनी हो, आस-पास रेस्टोरेंट देखने हों, मौसम का हाल जानना हो, रेसिपी देखनी हो, खरीदारी करनी हो… अंतहीन सूची है इंटरनेट के इस्तेमाल की. भारत में हिंदी इंटरनेट यूज़र का 30 करोड़ का संभावित बाज़ार है, जिसे आकर्षित करने के लिये हिंदी में लोकलाइज़ेशन के काम की बहुत बड़ी भूमिका होगी.

अगर आंकड़ों की बात करें, तो 41% से भी ज़्यादा भारतवासियों की मातृभाषा हिंदी है और 75% से ज़्यादा लोग या तो हिंदी बोल लेते हैं या समझ लेते हैं. हिंदी फ़िल्मों की वजह से जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा हिंदी अच्छी तरह समझता है. हिंदी बोलने वालों की कुल संख्या लगभग 45-55 करोड़ होगी. जबकि अगर ऑनलाइन कॉन्टेंट की बात करें, तो हिंदी का हिस्सा उसमें मात्र 0.1% है. चीन, जापान, रूस, पोलैंड, दुबई, सऊदी अरब की स्थानीय भाषाओं में मिलने वाले कॉन्टेंट का हिस्सा हिंदी से कहीं ज़्यादा है. 2014 में आई Google India की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश की 21% जनसंख्या हिंदी में इंटरनेट पर कॉन्टेंट पढ़ना पसंद करती है. अगर इंटरनेट पर कॉन्टेंट पढ़े जाने की वृद्धि दर के हिसाब से देखें, तो 2014 में हिंदी के लिए यह दर 94% थी जबकि अंग्रेज़ी के लिए यही दर 19% थी. ज़ाहिर है कि हिंदी के बाज़ार में अपार संभावनाएं हैं, इसीलिए तो Google, Facebook और Microsoft जैसी कंपनियों में लोकलाइज़ेशन की होड़ लगी है.

नेल्सन मंडेला ने एक बार कहा था, “अगर आप किसी से उस भाषा में बात करते हैं, जो वह सिर्फ़ समझता है, तो आपकी बात उसके दिमाग तक पहुँचती है. अगर आप उससे उसकी मातृभाषा में बात करते हैं, तो आपकी बात उसके दिल तक पहुँचती है.” और बात अगर खरीदारी की हो, तो फ़ैसला दिल ही करता है.

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